रविवार, 18 अक्टूबर 2020

नवरात्रि के बदलते स्वरूप

जसगीत अउ जवारा के संग गरबा

नव दिन के नवरात्रि म माता के जगराता होथे, हमन हिन्दू मन खासकर दुर्गा दाई के नव रूप ल मानथन, अलग अलग रूप के अलग विशेषता हवय, नव दुर्गा के शक्ति मातृत्व शक्ति के पहचान हरय, एक माता ह जीवन बनाये बर जन्म लेथे, ममता के मूरत होथे। नव दिन के नवरात्रि अउ महिला दिवस बस में नही जीवनभर एक एक दिन माता के शक्ति ह जीवन ल समृद्ध बनाथे, एक लईका के जन्म ले माँ के खुशी के कोनो ठिकाना नही रहय, जीवनभर के पुण्य ल अपन लईका के खुशी बर दुआ माँगथे की सुख अउ समृद्ध रहय। 
नवदुर्गा माता दुर्गा के नव रूप हरय, सबके अलग अलग स्वरूप हवय फेर सबो एके ममतामयी माता हरय, जेन म जड़ पदार्थ के महत्व, चेतना, जीव में वाणी, अंडा धारण, पुत्रवती, पुत्री, जड़ चेतन मृत्यु, अउ ज्ञान आदि नव रूप में मूल रूप ले मिलथे। जवारा अउ जसगीत ह पहली मूलरूप म रहय, नवरात्रि म नव दिन माता देवालय अउ गांव के देवालय मन म दिनमान अउ रतिया देवी गीत गाना बजाना करय, आघु दुर्गा देवी के मूर्ति नई रखे जात रहिस हवय, अउ रखे भी त एकदम गिने चुने, सबले बड़का जन गांव के मन जुरयातीच अउ जसगीत गान करय, माता देवालय अउ ठाकुरदईया म जवारा ल नवरात्रि के सुरु दिन बोतीच अउ नवरात्रि के अंतिम दिन विसर्जन होतीच, ओखर बीच मे अखण्ड जोत देवालय म जलय, अउ माता के जसगान होवय, पंडा ह जवारा के देखभाल करतीच अउ महाराज ह पूजापाठ बिहनिया अउ संझा कुन करय, आज भी गांव मनमा जवारा बोवथे, फेर धीरे धीरे विलुप्त होवत जात हवय, आघु काखरो काखरो घर के देवता म तको चलन रहय, नव दिन ले जवारा बोवय रहय अउ अंतिम दिन ठंडा होवय तेन दिन बखरा के बलि दे जावय। अब धीरे धीरे सब विलुप्त होवत जावत हवय, जसगीत के जगह ल माता के जगराता ह लेत हवय, तेन म स्टेज शो होथे माता के जगराता म चार चंदनी लगत हवय। आघु जसगीत म मन ह रम जवय, माता के प्रति अपार श्रद्धा निहित रहय, आघु जवारा तको बदय, अभी भी कोनो कोनो नेवज   अउ नवा तको खाते नवरात्रि म। नवरात्रि के अलग अलग राज म अलग अलग महत्व हवय, माता के उत्तर भारत म माता के जगराता प्रसिद्ध हवय त गुजरात के गरबा- डांडिया ह पुरा भारत अउ विश्व म प्रसिद्ध होवत जात हवय, अउ बंगाल के काली देवी के पूजा बर प्रसिद्ध हवय, माता के आराधना अलग अलग राज म विशेष रूप से करे जाथे। देखते देखत म गरबा ह माता के उपासना बर सबो मनखे ल पसंद आगे, गरबा नाच के माता के स्तुति करना अपन आप म माता के प्रति श्रद्धा अर्पित करे जाथे। बेरा के संग नवरात्रि के रूप बदलत जात हवय, जसगीत अउ जवारा ल आज भी देवालय म जिंदा रखे हवय। अभी कोरोना काल म हमन ल माता दुर्गा ह शक्ति देहि, अउ देवी दुर्गा ल पापों की विनाशिनी कहे जाथे, सबो मनखे के पाप ल दूर करही अउ हमन ल कोरोना ले मुक्ति दिलाही। माता के जगराता अउ उंखर अस्त्र शस्त्र के पूजा घर म रहिके करना उचित हवय, अउ कोरोना ल ध्यान म रखे माता ल घर मे खुश करना जरूरी हवय, पाप ले मुक्ति देहि अउ हमर पुनः जन्म कोरोना के बाद होही।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा" 

सोमवार, 15 जून 2020

मितान परम्परा

मितान परम्परा लुप्त होवत हवय

जीवन म किस्म किस्म के विचार देखे अउ सुने ल पड़ते, अपन अपन विचार सब ल भाते। जीवन के आपी धापी म अलग विचार मनखे ल महान बनाथे। आगु मितान परम्परा रहिस हवय, आज भी कुछु जगह ये ह जीवत हवय, समय के मांग के अनुसार मितान परम्परा के रूप बदलत जात हवय। विकास के दुनिया म मितान के रुप तको बदल गय। आगु मितान मितानीन बदे के परम्परा रहिस हवय, जेन ल मनखे मन जीवन भर निभावय, मितान अउ मितानीन के नाम गोदना अपन सरिर म गोदवय, जीवन म किस्म किस्म के रूप देखे बर मिलय। भोजली जेन दिन सरोय जाथे तेने भोजली ल जेखर संग मितान या मितानिन बदना रहिथे तेखर कान म भोजली ल खोच के एक दूसर ल नारियल भेंट करे के बाद गला मिलके अपन मितान बनाये जाथे, संग म अपन प्रेम, समझ, लग्न, विस्वास अउ विचार आदि ल साझा करके दुख सुख म संग देबे बर खड़े रहिथे, जीवन म अनेक बदलाव आथे सब म मितान ह अपन मितान के परछाई बने रहिथे। गोदना के रिवाज खत्म होवत हवय, ये ह अब टैटू के रूप ले लेहवय। मितान ल अंग्रेजी म फ्रेंड अउ हिंदी म दोस्त कहे जाथे, मितान के मायने भाषा के उच्चारण म बदल जाथे, अपनापन के जेन मिठास मितान म रहय तेन आज दोस्त अउ फ्रेंड म नई दिखाय, सब्द के फेर हरय अउ महत्व बदल जाथे, अगस्त के आगु इतवार के विश्व दोस्ती दिवस होथे, किस्म किस्म ल मनाये जाथे, सबके रूप भिन्न होथे, वास्तविकता परिस्थिति के साथ बदल जाथे। दोस्ती अउ मितान के तुलना करना मुस्किल हवय, मितान हमेसा बर रहय दोस्त तो हर साल बदल जाथे, घनिष्ठ दोस्त ल मितान कहे जा सकत हवय जेन ल आघु मितान संग साझा करे जावय तेन ल आज के मनखे मन अपन घनिष्ठ दोस्त ल साझा करें जाथे। विश्व म किस्म किस्म के विचार हवय, दोस्ती के अलग अलग उम्र म अलग महत्व हवय, उम्र के हर पड़ाव म अलग रूप ल निहारे जाथे, साक्ष्य बने ल लगथे। मितान मितानिन हमर जियत संस्कृति के हिस्सा हरय, जेन ह लुप्त होवत हवय, विश्व ल समझे के साथ हमन संस्कृति म बदलाव करत जावत हवन, संगे संग चलेबर सब करे बर पड़थे, सभ्य समाज के हिस्सा म सुख दुख बर एक मनखे के जरूरत पड़थे ओला दोस्त ह सब रूप ल पूरा करे जाथे, जीवन म सब स्थिति ले गुजरे ल पड़थे, भगवान ह मनखे बनाये हवय। खून के रिस्ता तको बनाये हवय, फेर हमन अपन रिस्ता दोस्ती के हमन खुद बनाथन, जेन ल हमन जीवनभर निभाथन। मितान मितानिन सादगी के अहसास दिलाथे, बेरा रहत जीवन के रंग ले रूबरू कराथे, सांसारिक जीवन ल अपन संग म रख दोस्ती के परिभासा बदल जात हवय।

आगु के मनखे

आगु के मनखे

बिहान ले रतिया तक कुछु न कुछु करय, बेरा म अपन काम ल करके अपन करम करय, जीवन के जमा पूंजी ल रखे रहय अउ बेरा के महत्व ल समझय। बिहान ले उठय त, रतिया के बचे भात ल बासी खावय। अहि जीवन म बिसोय पूंजी हरय। बिहान होवय त खेत खार जावय, वतके बेरा गाय गरुआ ल बरदी अउ पहट म जाय जेन ल चारए बर राउत लगे रहय। आगु के मनखे मन बासी धरके खेत जावय अउ खेत कमावय। काटा बीने ल खेत बनाय बर खेत बरसात के पहली जावय अउ खेत के कामकाज ल करय। आगु बेरा देखे बर घड़ी नई रहीस हवय त, जब मुड़ी के ऊपर घाम आवय अउ छांव ह मुड़ी के पांव म पड़य त 12बज जय त खेत ले घर आवय। अउ घर म रांधे बर खाना बनाये बर रहय तेन मन छानहि के छांव ल देख के रांधय। गांव म नदिया रहय नई रहय जेन गांव म उन्हा कुँआ अउ तालाब रहय, नहाये बर अउ सौचालय बर उन्हें के पानी ल उपयोग म लाय। बड़े बिहान ले कुँआ ले पानी लेगे बर माईलोग मन लग जाय, कोनो कोनो गांव म एके ठन कुँआ रहय त भीड़ होजय तेखर सेती अब्बड़ मन रतिया कुन बर्तन मांजे बर पानी जोर लय। अंधियारा म जिंदगी बीतय, बिजली के कोनो सुविधा नई रहीस हवय, अंधियार म रतिया कटय, उतार चढ़ाव म जीवन बीतय। आय जाये बर गाड़ी नई रहीस हवय, बैला गाड़ी अउ घोड़ा गाड़ी के उपयोग साधन बर करय, जीवन म कुछ भी सुख दुख के सन्देश आवय त रेंगत रेंगत नाउ ह नई त अधियारा मन बेटीमाई मन घर समाचार लेके आवय तब तक बेरा होगे रहय। जीवन के अलग अलग रूप ह अलग अलग दृस्य दिखाए हवय। जब फसल जादा नई होवय अउ पानी कम गिरय त धान बर पानी कम पड़ जाय अउ खेतखार म बन ह बड़े बड़े जाम जय त दुकाल पर जावय, जीवन म किसान मन बर ये ह सबले बड़े दुख रहय, खाये के लाले पड़ जावय त कोदो बोवय, असाढ़ म बोतीस त कार्तिक म अन्न हो जय, 60 दिन लगय। अउ ओला मिंज के घर म लावय अउ जबतक दूसर फसल बर पानी नई मिलय तब तक ओहि जीवकोपार्जन बर रहय। जीवन ह एक तरह ले अलग थलग रहय, जेन भी काम रहय ओला कर लय। दाऊ, जमींदार मन घर तको दुकाल परय, खाये बर कुछु नई रहय, पानी गिरय त गाय गरुआ मन बर तको पिये बर होवय, पहली बोर नई रहीस हवय, नदिया रहय नई त कुँआ अउ तालाब रहय, जेखर पानी म अउ बरसात के पानी म जीवनयापन करय। आजादी के बाद बिजली गाँव मन म आत गे हवय, तब जाके सुख सुविधा हवय, नही त आगु के मन जीवनयापन अब्बड़ दुख म करे हवय, फेर सुख तको रहिस हवय, आगु गरमी कम रहय अब तो भोम्भर जरत हवय अउ मनखे मन बाहर निकली गरमी त टघल तको जहि एकोदिन। आगु के मनखे अउ आज म जमीन के अंतर हवय, विकास म हमन रम गे हवन। आगु के मन नींव रखे हवय ओहि म हमन आगु बढ़त हवन।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
बीएससी अध्ययनरत
रामनगर,कवर्धा,छत्तीसगढ़

बोवारा चालू होही

बोवारा चालू होही 

छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा कहे जाथे येहा सत्य हरय इंहा नाना  किस्म के धान बोय जाथे। किस्म किस्म के बीज मिलथे धान के अउ पूरा विश्व म इंहा के चावल ल पसन्द करे जाथे। धान के संगे संग मक्का, सोयाबीन, रहेर, उरीद अउ सब्जी बर तको प्रसिद्ध हवय। किसान के किसानी जांगर रहत ले करिथे, छत्तीसगढ़ ह खेती किसानी वाले राज्य हरय, इंहा के आधा ले ज्यादा आबादी ह खेत म निर्भर हवय। आसाढ़ लगे हवय अउ खेत के काढ़ तको छोला गे हवय, धना खेत तको बने ल धर ले हवय, कांटा खुटी तको बिना गे हवय अउ नई साफ होये हवय तेन मन अभी भी करत हवय। मानसून आये के आघु ले खेत ल उपजाऊ बनाये बर जोते ल धर ले हवय जेखर ले नमी बने रहय, जोते अउ मृदा जांच बर आघु हवय, उत्पादन अच्छा होवय कहिके किसान मन खेत के काम म लगे हवय अउ साफ सफाई करत हवय। खेती किसानी म बर्बाद हो जाथे तभो किसान मन किसानी ल नई छोड़य जिनगी म करम करत जाथे अउ फल के चिंता बिना बोवारा करथे, कभू कभू तो पानी नई गिरय त फसल ह नुकसान हो जाथे फेर एखर चिंता ल छोड़ फसल उत्पादन करे बर नई छोड़य, सबके पेट भरे के काम किसान करथे, अपन हड़ा ल सकेल के काम करथे अउ सबला भरपुर अन्न देथे। खरीफ फसल के बोवारा के समय होवत हवय, अधिक तापमान अउ आर्द्रता के आवश्यकता होथे। किसानी म इंहा के मन जियत हवय, अउ माटी ल गढ़त हवय, जिनगी म किसान के रहत ले इंसान सुख रही जिये बर खाय बर लगही जेन ल किसानी ले उपजे जाथे। बोवार चलत हवय, खेत के मेड़ ल साफ सुधरा कर डरे हवय, धान के थरा दे के काम चलत हवय, थरा म उपज अब्बड़ होथे, थरा ह 15-20 रोज म रोपा लगाए बर हो जाथे, धना खेत ल जोत के अउ पानी भरके मताके ओमा परहा लगाए जाथे। धान ह सोन कस चमकथे, सोनहा कस बाली ह लहराथे। बोवारा के बेरा म अरहर ल छिच देथे या फेर बोवारा करे के मसीन ले बोये जाथे जेखर से एक सीधा म बोवा जाथे, अइसने सोयाबीन ल तको बोय जाथे। बोवारा करके किसान मन पानी पलोथे या फिर बादर ह बरस जाथे त नई लगय, अउ फसल ल पर्याप्त मात्रा म पानी मिल जाथे, नींदा ल निंदानाशक डालके खत्म करे जाथे या फेर बेरा बेरा म ओला नींदे जाथे, तेखर सेती फसल ह कचरा म नई डूबय अउ फसल के पैदावार तको बने होथे। बोवारा चालू होथे तहाँ किसान मन पानी तिहार, माटी तिहार, बादर तिहार, अन्न तिहार, बोवारा तिहार, पेड़ तिहार आदि मनाथे अउ फसल अच्छा होवय ओखर दुआ मांगथे।  खरीफ फसल म कोदों, दुबी, मकड़ा, गाजर घास, धतूरा, कनकवा, मोथा, बड़े दूधी, साठी आदि होथे जेन ह अधिक मात्रा म  पोटेशियम, नाइट्रोजन, फास्पोरस, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम ल ले अपन उपजे बर ले लेथे तेखर बर बीच बीच म किसान मन दवा डालत रहिथे।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा" 
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