रविवार, 18 अक्टूबर 2020
नवरात्रि के बदलते स्वरूप
सोमवार, 15 जून 2020
मितान परम्परा
मितान परम्परा लुप्त होवत हवय
जीवन म किस्म किस्म के विचार देखे अउ सुने ल पड़ते, अपन अपन विचार सब ल भाते। जीवन के आपी धापी म अलग विचार मनखे ल महान बनाथे। आगु मितान परम्परा रहिस हवय, आज भी कुछु जगह ये ह जीवत हवय, समय के मांग के अनुसार मितान परम्परा के रूप बदलत जात हवय। विकास के दुनिया म मितान के रुप तको बदल गय। आगु मितान मितानीन बदे के परम्परा रहिस हवय, जेन ल मनखे मन जीवन भर निभावय, मितान अउ मितानीन के नाम गोदना अपन सरिर म गोदवय, जीवन म किस्म किस्म के रूप देखे बर मिलय। भोजली जेन दिन सरोय जाथे तेने भोजली ल जेखर संग मितान या मितानिन बदना रहिथे तेखर कान म भोजली ल खोच के एक दूसर ल नारियल भेंट करे के बाद गला मिलके अपन मितान बनाये जाथे, संग म अपन प्रेम, समझ, लग्न, विस्वास अउ विचार आदि ल साझा करके दुख सुख म संग देबे बर खड़े रहिथे, जीवन म अनेक बदलाव आथे सब म मितान ह अपन मितान के परछाई बने रहिथे। गोदना के रिवाज खत्म होवत हवय, ये ह अब टैटू के रूप ले लेहवय। मितान ल अंग्रेजी म फ्रेंड अउ हिंदी म दोस्त कहे जाथे, मितान के मायने भाषा के उच्चारण म बदल जाथे, अपनापन के जेन मिठास मितान म रहय तेन आज दोस्त अउ फ्रेंड म नई दिखाय, सब्द के फेर हरय अउ महत्व बदल जाथे, अगस्त के आगु इतवार के विश्व दोस्ती दिवस होथे, किस्म किस्म ल मनाये जाथे, सबके रूप भिन्न होथे, वास्तविकता परिस्थिति के साथ बदल जाथे। दोस्ती अउ मितान के तुलना करना मुस्किल हवय, मितान हमेसा बर रहय दोस्त तो हर साल बदल जाथे, घनिष्ठ दोस्त ल मितान कहे जा सकत हवय जेन ल आघु मितान संग साझा करे जावय तेन ल आज के मनखे मन अपन घनिष्ठ दोस्त ल साझा करें जाथे। विश्व म किस्म किस्म के विचार हवय, दोस्ती के अलग अलग उम्र म अलग महत्व हवय, उम्र के हर पड़ाव म अलग रूप ल निहारे जाथे, साक्ष्य बने ल लगथे। मितान मितानिन हमर जियत संस्कृति के हिस्सा हरय, जेन ह लुप्त होवत हवय, विश्व ल समझे के साथ हमन संस्कृति म बदलाव करत जावत हवन, संगे संग चलेबर सब करे बर पड़थे, सभ्य समाज के हिस्सा म सुख दुख बर एक मनखे के जरूरत पड़थे ओला दोस्त ह सब रूप ल पूरा करे जाथे, जीवन म सब स्थिति ले गुजरे ल पड़थे, भगवान ह मनखे बनाये हवय। खून के रिस्ता तको बनाये हवय, फेर हमन अपन रिस्ता दोस्ती के हमन खुद बनाथन, जेन ल हमन जीवनभर निभाथन। मितान मितानिन सादगी के अहसास दिलाथे, बेरा रहत जीवन के रंग ले रूबरू कराथे, सांसारिक जीवन ल अपन संग म रख दोस्ती के परिभासा बदल जात हवय।
आगु के मनखे
आगु के मनखे
बिहान ले रतिया तक कुछु न कुछु करय, बेरा म अपन काम ल करके अपन करम करय, जीवन के जमा पूंजी ल रखे रहय अउ बेरा के महत्व ल समझय। बिहान ले उठय त, रतिया के बचे भात ल बासी खावय। अहि जीवन म बिसोय पूंजी हरय। बिहान होवय त खेत खार जावय, वतके बेरा गाय गरुआ ल बरदी अउ पहट म जाय जेन ल चारए बर राउत लगे रहय। आगु के मनखे मन बासी धरके खेत जावय अउ खेत कमावय। काटा बीने ल खेत बनाय बर खेत बरसात के पहली जावय अउ खेत के कामकाज ल करय। आगु बेरा देखे बर घड़ी नई रहीस हवय त, जब मुड़ी के ऊपर घाम आवय अउ छांव ह मुड़ी के पांव म पड़य त 12बज जय त खेत ले घर आवय। अउ घर म रांधे बर खाना बनाये बर रहय तेन मन छानहि के छांव ल देख के रांधय। गांव म नदिया रहय नई रहय जेन गांव म उन्हा कुँआ अउ तालाब रहय, नहाये बर अउ सौचालय बर उन्हें के पानी ल उपयोग म लाय। बड़े बिहान ले कुँआ ले पानी लेगे बर माईलोग मन लग जाय, कोनो कोनो गांव म एके ठन कुँआ रहय त भीड़ होजय तेखर सेती अब्बड़ मन रतिया कुन बर्तन मांजे बर पानी जोर लय। अंधियारा म जिंदगी बीतय, बिजली के कोनो सुविधा नई रहीस हवय, अंधियार म रतिया कटय, उतार चढ़ाव म जीवन बीतय। आय जाये बर गाड़ी नई रहीस हवय, बैला गाड़ी अउ घोड़ा गाड़ी के उपयोग साधन बर करय, जीवन म कुछ भी सुख दुख के सन्देश आवय त रेंगत रेंगत नाउ ह नई त अधियारा मन बेटीमाई मन घर समाचार लेके आवय तब तक बेरा होगे रहय। जीवन के अलग अलग रूप ह अलग अलग दृस्य दिखाए हवय। जब फसल जादा नई होवय अउ पानी कम गिरय त धान बर पानी कम पड़ जाय अउ खेतखार म बन ह बड़े बड़े जाम जय त दुकाल पर जावय, जीवन म किसान मन बर ये ह सबले बड़े दुख रहय, खाये के लाले पड़ जावय त कोदो बोवय, असाढ़ म बोतीस त कार्तिक म अन्न हो जय, 60 दिन लगय। अउ ओला मिंज के घर म लावय अउ जबतक दूसर फसल बर पानी नई मिलय तब तक ओहि जीवकोपार्जन बर रहय। जीवन ह एक तरह ले अलग थलग रहय, जेन भी काम रहय ओला कर लय। दाऊ, जमींदार मन घर तको दुकाल परय, खाये बर कुछु नई रहय, पानी गिरय त गाय गरुआ मन बर तको पिये बर होवय, पहली बोर नई रहीस हवय, नदिया रहय नई त कुँआ अउ तालाब रहय, जेखर पानी म अउ बरसात के पानी म जीवनयापन करय। आजादी के बाद बिजली गाँव मन म आत गे हवय, तब जाके सुख सुविधा हवय, नही त आगु के मन जीवनयापन अब्बड़ दुख म करे हवय, फेर सुख तको रहिस हवय, आगु गरमी कम रहय अब तो भोम्भर जरत हवय अउ मनखे मन बाहर निकली गरमी त टघल तको जहि एकोदिन। आगु के मनखे अउ आज म जमीन के अंतर हवय, विकास म हमन रम गे हवन। आगु के मन नींव रखे हवय ओहि म हमन आगु बढ़त हवन।
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
बीएससी अध्ययनरत
रामनगर,कवर्धा,छत्तीसगढ़